फ्री की योजनाए देश की अर्थव्यवस्था के लिए 'गंभीर मुद्दा' -सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि मुफ्त और सामाजिक कल्याण योजनाएं दो अलग-अलग चीजें हैं और अर्थव्यवस्था को धन की हानि और कल्याणकारी उपायों के बीच संतुलन बनाना है। इसके साथ ही अदालत ने मुफ्त उपहार देने के लिए राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने की संभावना से भी इनकार किया। कोर्ट ने विभिन्न पक्षों से 17 अगस्त से पहले इस पहलू पर सुझाव देने को कहा है

मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि चुनाव के दौरान तर्कहीन मुफ्त देने का वादा करने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता समाप्त करने का विचार "अलोकतांत्रिक" है। पीठ की ओर से मुख्य न्यायाधीश रमन ने कहा कि मैं किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने के मामले में नहीं जाना चाहता क्योंकि यह एक अलोकतांत्रिक विचार है... उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान तर्कहीन मुफ्त उपहार का वादा एक "गंभीर मुद्दा" है, लेकिन इस संबंध में वैधानिक स्थिति स्पष्ट नहीं होने पर भी वह विधायी क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं करेंगे।
पीठ ने कहा कि आप मुझे उदासीन या रूढ़िवादी कह सकते हैं लेकिन मैं विधायी क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं करना चाहता... मैं एक रूढ़िवादी हूं। मैं विधायिका के क्षेत्रों पर अतिक्रमण नहीं करना चाहता। यह एक गंभीर विषय है। यह कोई आसान बात नहीं है। आइए हम भी दूसरों की सुनें। मुख्य न्यायाधीश 26 अगस्त को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ वकीलों द्वारा कुछ सुझाव दिए गए हैं। उन्होंने शेष पक्षों को अपनी सेवानिवृत्ति से पहले आवश्यक कदम उठाने के लिए कहा और मामले की आगे की सुनवाई के लिए 17 अगस्त की तारीख तय की।
उन्होंने कहा कि मुफ्त उपहार और समाज कल्याण योजनाएं अलग हैं... अर्थव्यवस्था और लोगों के कल्याण के लिए धन की हानि - दोनों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है और इसलिए बहस होती है। कोई ऐसा होना चाहिए जो अपनी दृष्टि और विचारों को सामने रख सके। कृपया मेरी सेवानिवृत्ति से पहले कुछ सुझाव दें। सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है। याचिका में राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान मुफ्त उपहार का वादा करने की प्रथा का विरोध किया गया है और चुनाव आयोग से उनके प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाने और उन्हें अपंजीकृत करने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का आग्रह किया गया है।
उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह की दलीलों पर ध्यान देते हुए पीठ ने कहा, "यह एक गंभीर मुद्दा है और जो (मुफ्त उपहार प्राप्त कर रहे हैं) इसे चाहते हैं। हमारे पास एक कल्याणकारी राज्य है। कुछ लोग कह सकते हैं कि वे कर का भुगतान कर रहे हैं और इसे विकास कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल किया जाना है... इसलिए समिति को दोनों पक्षों की बात सुननी चाहिए।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हाल ही में कुछ राजनीतिक दलों ने मुफ्त उपहारों के वितरण को एक कला के स्तर तक बढ़ा दिया है। इसी के आधार पर चुनाव लड़े जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के चुनावी परिदृश्य में कुछ दल समझते हैं कि चीजों का मुफ्त वितरण ही समाज के लिए 'कल्याण उपायों' का एकमात्र तरीका है। यह समझ पूरी तरह से अवैज्ञानिक है और इससे गंभीर आर्थिक संकट पैदा होगा। शीर्ष कानून अधिकारी ने 'परेशान' बिजली क्षेत्र का उदाहरण दिया और कहा कि कई बिजली उत्पादन और वितरण कंपनियां पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम) हैं और वित्तीय संकट में हैं।

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